हार के बावजूद कांग्रेस की स्थिति में हो रहा है सुधार, मुखर नेता के रूप में उभर रहे राहुल गांधी

loading...

बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को तैयार करें 2019 के लोस चुनाव के लिये

राजनीति में न तो कोई किसी का स्थायी दुश्मन होता है और न ही दोस्त। यह कहावत आज की नहीं पुरानी है मैदान चाहे कुश्ती का हो अथवा चुनाव का। जब दो पहलवान और पार्टियां मैदान में उतरेगी तो एक को हार और दूसरे को जीत मिलना तय है। इसी प्रकार रात और दिन काला ओर गोरा होना जिस प्रकार विधि का विधान है उसी प्रकार हार जीत की यह परम्परा सदियों से चली आ रही है।
ऐसे में अगर कांग्रेस कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनावों की 224 सीटो पर 222 सीटो में से चुनाव में 78 सीटे लेकर दूसरे नंबर पर रही तो मीडिया आदि कांग्रेस नेता राहुल गांधी के पीछे इतना क्यों पड़ गए। हार जीत तो सामान्य सी बात है। उनके नेतृत्व में 78 सीटो पर उम्मीदवार विजयी रहे एक मंझे हुए नेता की भांति भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिये उनके द्वारा तुरंत जेडीएस को अपना समर्थन देकर विपक्ष को सरकार बनाने का रास्ता साफ कर दिया। जो अपने आप में एक बड़ा और सुलझा हुआ तुरंत लिया गया सही निर्णय ही कहा जा सकता है।
कांग्रेस के विरोधी दलों के नेता फरमा रहे हैं कि कभी से निकाले गए निवर्तमान सीएम सिद्धारमैया अपने राजनीतिक दुश्मन कहे जाने वाले कुमार स्वामी को मुख्यमंत्री तक की कुर्सी पर बिठाने से नहीं चूकें। इसे एक समय से लिया गया व सूझबूझ भरा निर्णय भी सिद्धारमैया का कहा जा सकता हैं
मेरा कांग्रेस या किसी विपक्षी दल अथवा भाजपा से किसी प्रकार का कोई राजनीतिक लगाव तो नहीं है। हां वोट जरूर कुछ कारणों से भाजपा उम्मीदवारों को देता रहा हूं, लेकिन मुझे लगता है कि मीडिया और कुछ राजनेता एकत्रित होकर राहुल गांधी का मनोबल तोड़ने और उन्हे अपने व्यंगवाणों से उनकी ही पार्टी से विवादित बनाने की कोशिश कर रहे हैं जिस राजनीति में ठीक नहीं कहा जा सकता।
किसी ने लिखा सभी मोर्चाें पर हारे गांधी और आखिर कब तक सबक लेगी कांग्रेस। काम नहीं आया राहुल का बड़बोलापन एक नेता जी ने तो उन्हे अपने प्रदेश में आकर रहने का न्यौता तक दे डाला।
मैं ठहरा निक्षर और जाहिल इसलिये मुझे राजनीति का ज्यादा ज्ञान तो नहीं। लेकिन जितना शब्द मिलाकर पढने और खबरांे से अहसास होता है कि उससे यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस अगर जेडीएस , राजद, बसपा सपा और रालोद से मिलकर यहां चुनाव लड़ती तो स्थिति चुनाव परिणाम कुछ ओर ही होतें।
लेकिन राजनीति में सबकुछ संभव है और कुछ भी असंभव नहीं। इसलिये भूली विसरी विसार दे वाली ग्रामीण कहावत को ध्यान में रखकर कांग्रेसियों को राहुल जी के नेतृत्व में आगे बढ़ना चाहिये। कर्नाटक की हार कोई हार नही। ऐसा तो हर चुनाव और लोकतंत्र में हमेशा होता रहा है।
2014 में हुए लोकसभा चुनावों में जो स्थिति कांग्रेस की बनी अब उससे कई गुना अच्छी कही जा सकती है क्योंकि विपक्ष को उपचुनावों में अच्छा समर्थन मिल रहा है और विधानसभाओं में भले ही शासित प्रदेशों में सफलता न मिल रही हो सरकार बनाने की मगर मजबूत विपक्ष की भूमिका तो वो निभा ही सकती हैं ।
इन चुनाव परिणामों को कांग्रेस के राष्टीय अध्यक्ष राहुल गांधी को घेरने में लगे राजनीतिक दलों के नेता व मीडिया को देश मे 1977 में लगी अपातकालीन स्थिति और उसके बाद हुए लोस चुनाव में कांग्रेस की जो मटटी खराब हुई थी चुनावी परिणाम के रूप में उसकी समीक्षा करनी चाहिये। क्योंकि उसके कुछ वर्ष बाद ही जब पुनः चुनाव हुए तो कांग्रेस सत्ताधारी पार्टी के मुकाबले काफी अच्छी स्थिति में उभरकर सामने आयी थी। ओर अगर ध्यान में से देखे तो आज की तारीक में कुछ प्रदेशों को छोड़कर भले ही भाजपा सत्ता संभाल रही हो मगर ज्यादातर में विपक्ष की स्थिति भी कोई ज्यादा खराब नहीं हैं। मैं कोई कांग्रेस का वक्ता या भोपूं नहीं है पर फिर भी यह कह सकता हूं कि जिस प्रकार हाथ धोखकर कुछ लोग वर्तमान समय में मुखर वक्ता और झूंजारू नेता राहुल गांधी के पीछे पड़े है उससे जहां तक मेरी समझ है कोई भी बडा राजनेता न तो घबराने वाला होता है और न ही हार जीत से उससे की सेहत पर कोई फर्क पड़ता है। रही बात कांग्रेस की तो जेसे जैसे समय गुजर रहा है राहुल गांधी अब सुलझे हुए नेता और प्रवक्ता के रूप में उभरकर सामने आ रहे हैं। हार के बावजूद उनके नेतृत्व में कांग्रेस की स्थिति में सुधार होता जा रहा है। कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि कुछ न समझों के द्वारा कारण कोई भी हों। की बात पर ध्यान राहुल गांधी को नहीं देना चाहिये। उन्हे चाहिये कि देशभर के अपने कार्यकताओं को अभी ओर संगठित करे और बूथ स्तर पर कांग्रेस को इतना मजबूत बनाए की 2019 के लोकसभा चुनाव या उससे पहले कुछ प्रदेशों में होने वाले विधानसभा चुनावों में विपक्ष के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की ऐसी रणनीति तेयार की जाए जिससे परिणाम अच्छे ही आने की संभावना में बढोतरी हो।तथा इसके लिये जो मुददे उठाए जाये उनकी भी कांग्रेस नेता समीक्षा करें ।

इसे भी पढ़िए :  2019 कावासाकी वर्सिस 650 एडवेंचर मोटरसाइकल भारत में लॉन्च, कीमत ₹ 6.69 लाख

– रवि कुमार विश्नोई
राष्ट्रीय अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
MD – www.tazzakhabar.com

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

two × three =