कनार्टक विधानसभा चुनाव परिणाम 4,343 करोड़ अपनी उपलब्धियों के प्रचार पर खर्च कर, भाजपा जीत पर इतराए नहीं कांग्रेस हारी नहीं जेडीएस से मिलकर बना सकती है सरकार

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कर्नाटक विधानसभा चुनाव के आज आए परिणामों को लेकर भाजपाई काफी खुश है तो विपक्ष को भी अफसोस करने की जरूरत शायद नहीं है। क्योंकि सरकार कोई भी बनाए विधानसभा में विपक्ष मजबूत होगा तथा यह भी हो सकता है कि कांग्रेस के समर्थन से जेडीएस बिना सरकार बनाते तो हां यह भी जरूर है कि सरकार किसी की भी हो निरंकुश नहीं हो पाएगी। भाजपाई जगह जगह देशभर में मिठाईयां बांट एक दूसरे को बधाई देकर खुशी मना रहे हैं। और ऐसा होना भी चाहिये क्योंकि जीत तो जीत है। मगर यह बात भी किसी से छुपी नहीं है कि विपक्षी दल अगर एक हो गए तो भाजपा से कमजोर सिद्ध नहीं होंगे। लेकिन जहां तक उम्मीद की जा रही है। उससे यह लगता है कि जोड़ तोड़ सरकार बनाने के लिये अवश्य करनी पड़ेगी चाहे वो कोई भी करें एक ही वोट के लिये क्यों न हों।
224 सीट वाली विधानसभा में संपन्न हुए 222 सीट के चुनाव परिणाम जो आये उससे यह बात तो स्पष्ट हो रही है कि भाजपा आशा के अनुकूल सभी दावों के बावजूद चुनाव परिणाम नहीं आ पाए हैं। जबकि अभी तक मई 2014 में सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने अपनी उलब्धियों के प्रचार प्रसार के कार्याें पर लगभग 4, 343 करोड़ रूपये खर्च किये। और यह कोई मामूली रकम नहीं कहीं जा सकता। इसके बावजूद कुछ प्रदेशों में लोकसभा उपचुनावों तथा गुजरात व अब कर्नाटक विधानसभा में जो स्थिति भाजपा की रही इतना प्रचार करने के बाद भी वो कोई बहुत अच्दी नहीं कहीं जा सकती। सरकार भले ही भाजपा ने बनाई हो लेकिन वोटों का मत प्रतिशत घटा बताया जा रहा है और उपचुनाव में तो राजस्थान, बिहार, यूपी में उसके पक्ष में चुनाव परिणाम अच्छे नहीं रहें।
लेकिन फिर भी भाजपा अब 22वें राज्य में सरकार बनाने की ओर अग्रर सर है। क्योंकि पर्व में कांग्रेस शासित प्रदेशों में पंजाब को छोड़ अभी तक भाजपा को या तो पूर्ण सफलता मिल रही है या फिर तोड़फोेड के दम पर वो सरकार बनाए जा रही है। इसके पीछे एक मुख्य कारण यह भी है कि भाजपा के नेता अपनी रैलियों में आक्रामक होकर प्रचार कर रहे हैं जबकि कांग्रेस के पास सिर्फ राहुल गांधी ऐसे नेता नजर आए जिन्होंने चुनावी प्रचार का जवाब दिया। लेकिन कुछ गलतियां उसके नेताओं के द्वारा रही। अगर कांग्रेस के नेता तोड़ा संभल कर बोलते और कुछ मुददो जैसे की जीएसटी पर बयान देने से पहले विचार मंथन किया होता तो शायद कर्नाटक के चुनाव परिणाम कुछ ओर होते।
मगर जो दिखाई दे रहा है उसके अनुसार कांग्रेस के पास कार्यकर्ताओं की कमी नही। कुछ निष्ठावान नेता भी है। मगर जैसा नजर आता है कि यह पार्टी अपने आस्थावान व निष्ठावान कार्यकर्ताओं को जोड़कर उन्हे चुनाव में जीत के लिये संघर्ष करने हेतु तैयार नहीं कर पायी। और इसकी जीत का मुख्य कारण रहे सवर्ण मतदाता पिछले दिनों कांग्रेस के कुछ नेताओं ने जो जीएसटी को लेकर बवाल मचाया उससे व्यापारी उद्योगपति व इससे जुड़े वोट अलग हो गए। जिसका लाभ भाजपा को मिला।
परिणाम स्वरूप उसने कर्नाटक में एक बड़े दल के रूप में अपनी जीत का परचम लहराने में सफलता प्राप्त कर ली। ,
मुझे लगता है की कांग्रेस के नेता कुछ अंतर से मिली पराजय से सबक लेंगें। तथा विपक्षी एकता राष्टीय स्तर पर लोकसभा चुनाव में और राज्य स्तर पर क्षेत्रीय दलों के साथ करने में कोताही नहीं बरतेंगे। अगर ऐसा होता है। और कांग्रेस नेता देश के गली मोहल्लों में मौजूद पूराने आस्थावान अपने मतदाताओं और निष्पक्ष सोच रखने वाले वोटरों को लुभाने में सफल रहें तो भविष्य में उनकी उम्मीदों को पंख लग सकते हैं। मगर इसके लिये अभी से कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी जी को हर जिला मुख्यालय से लेकर गांव स्तर तक के संगठन में पदाधिकारी बने बैठे अपने नेताओं को यह समझाना होगा कि वो सबको साथ लेकर चलें। जब कोई मिटिंग या आंदोलन व धरना प्रदर्शन होता है तो चार आदमी नहीं उसमे हर कार्यकर्ता को बुलाकर जोड़ने का प्रयास करें। तो भविष्य में एक अच्छा माहौल उसके पक्ष में बन सकता है। रही बात हार जीत की तो मुझे तो यह लगता है कि भाजपा को ज्यादा विधायक जीताने में सफलता तो मिली लेकिन कम उम्मीदवार जीतने के बाद भी कांग्रेस चुनाव नहीं हारी और उसे मजबूत विपक्ष का दर्जा तो मिलेगा ही और अगर कहीं जो विपक्षी दल अलग अलग होकर चुनाव लडे वो सब एक हो गए तथा सत्ताधारी पार्टी का प्रभाव नहीं माना तो यहां सत्ता संभालने का प्रयास काफी काफी रोचक हो सकता है।
मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूं कि राहुल गांधी जी और सोनिया गांधी जी को चाहिये वो भविष्य में होने वाले विधानसभा व लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखेत हुए अपने नेताओं की जबान पर लगाम लगाए ओर एक समिति का गठन करें जो बयान देने और किन मुददो पर बोलना है वो तय करें।
तथा हर नेता को जनरल बात तो ओर है विशेष बिंदुओं को लेकर बोलने से रोका जाए क्योंकि बिना सोचे समझे इनकी भाषण बाजी से कांगे्रेस को बढ़ा नुकसान हो रहा है। राहुल जी अगर बीते चुनावों में मिली पराजय से सबक लेकर संगठन को केंद्र से जमीन तक मजबूत करने में सफल हो गए तो आगे चलकर जो चुनाव होने है उनमे जीते हारे कोई भी मगर मतदान का प्रतिशत कांग्रेस के समर्थन में बड़ेगा तथा चुनाव परिणाम भी प्रभावित होंगें यह बात विश्वास के साथ कहीं जा सकती है। कुछ लोग कह रहे हैं की नेपाल में प्रधानमंत्री जी द्वारा जो भजन किया गया उसका परिणाम है कनार्टक का चुनाव परिणामा। मेरा मानना है कि कांग्रेस के नेताओं के बिगड़े बोल है इसके लिये जिम्मेदार। रही बात सरकार बनाने की तो वो उस समय ही तय होगी की कौन सत्ता संभाल सकता है।

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– रवि कुमार विश्नोई
राष्ट्रीय अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
MD – www.tazzakhabar.com

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