गंभीर मामला है पर्यावरण संरक्षण के लिए संग्रहित एक लाख करोड रुपये के दुरुपयोग का…

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पर्यावरण संरक्षण के लिए माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर बनाये के कोष के दुरुपयोग को लेकर एक खबर के अनुसार केन्द्र सरकार को फटकार लगाई गई है। जस्टिस मदन लोकुर व दीपक गुप्ता की बैच ने सरकार की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि उसने पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाये गये कोष मंे एकीकृत एक लाख करोड रुपये के कोष अन्यत्र इस्तेमाल कर ठीक नहीं किया, उनका कहना था कि कार्यपालिका पर भरोसा किया मगर अधिकारी काम नहीं करते और जब हम पूछते हैं तो कहा जाता है कि न्यायिक सक्रियता ज्यादा है। लेकिन विभिन्न कोषों के अन्तर्गत संग्रहित विशाल राशि का इस्तेमाल सिर्फ पर्यावरण और जनता के लाभ के ही होना था, यह बात एकदम साफ है मगर इसका उपयोग इसके विपरीत किया गया। वैसे तो यह बड़ा मामला है इसमें कुछ भी कहना या टिप्पणी करना मेरे लिए ठीक नहीं लगता लेकिन क्योंकि यह पैसा किसी न किसी रूप में आम जनता के खून पसीने की मेहनत की रकम जो टैक्सों के रूप मंे मिलती है उसी में यह कोष बना, माननीय उच्चतम न्यायालय की निगाह इस पर है तो यह पता भी चल रहा है जबकि ऐसे अनेकों कोष बनते है और उनका रुपया कहां खर्च हो जाता है इसका भी पूरी तौर पर पता नहीं चलता, जनहित के पैसे के संदर्भ में माननीय उच्चतम न्यायालय ने संज्ञान लिया जिसके लिए आम आदमी उसका आभारी है मेरा मानना है कि सरकार की अन्य योजना पर भी किसी ना किसी रूप में माननीय न्यायालय को खुद या कोई पर्यवेक्षक नियुक्त कर ऐसे बनाये जाने वाले कोष पर निगाह रखने की व्यवस्था जनहित में करनी चाहिए। क्योंकि जनता को तो सरकार के अधिकारी कुछ भी बताने को तैयार नहीं होते हैं, इसलिए कभी कभी तो पैसा किस मद में खर्च हुआ पता नहीं चलता, पिछले वर्ष एक समाचार पत्र मंे खबर पढ़ने को मिली थी श्रमिकों के हित के लिए बने कोष में जो पैसा मिला उससे अधिकारियों ने वांशिग मशीन जैसी चीजें खरीदी जो इस बात का प्रतीक है कि कहीं ना कहीं जनता के हित के पैसे का दुरुपयोग होता है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए गए कोष में एकत्रित एक लाख करोड रूपए के अन्यत्र इस्तेमाल पर अदालत ने केन्द्र सरकार को फटकारा। सुप्रीम कोर्ट ने साफतौर पर कहा कि सरकार उसे बेवकूफ बना रही है। जस्टिस मदन लोकुर और दीपक गुप्ता की बेंच ने सरकार की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि उसने कार्यपालिका पर भरोसा किया लेकिन प्राधिकारी काम ही नहीं करते और जब हम कुछ कहते हैं जो यह कहा जाता है कि यह तो न्यायिक सक्रियता है। बेंच ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर बनाए गए विभिन्न कोषों के अंतर्गत संग्रहीत इस विशाल राशि का इस्तेमाल सिर्फ पर्यावरण कार्यांे और जनता के लाभ के लिए ही होना था। अदालत ने कहा कि यह एकदम साफ है कि जिस काम के लिए यह रकम थी उसका उपयोग उससे इतर कार्यांे में किया गया। आप क्या चाहते हैं कि अदालत कितनी दूर जाए। हमने कार्यपालिका पर भरोसा किया लेकिन वे कहते हैं जो हमारी मर्जी होगी, हम वह करेंगे। पहले, हमें उन्हें पकडना होगा कि आपने हमारे विश्वास को तोड़ा और धन का अन्यत्र इस्तेमाल किया। क्या हम पुलिसकर्मी या जांच अधिकारी हैं। हम किसी छोटी रकम के बारे में बात नहीं कर रहे हैं। यह बहुत ही
निराशाजनक है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि करीब 11 हजार 700 करोड़ रूपए वनीकरण क्षतिपूर्ति कोष प्रबंधन और नियोजन प्राधिकरण (र्केपा) में था जिसका सृजन अदालत के आदेश के तहत हुआ था और इस तरह के सभी कोषों में जमा कुल राशि करीब एक लाख करोड़ रूपए है। हालांकि, एक वकील ने अदालत को बताया कि र्केपा से करीब 11 हजार करोड़ पहले ही खर्च हो गया है और इसमें कुल 50 हजार करोड़ रूपए होंगे। अदालत ने कहा कि हमें क्या करना है। आप लोग काम नहीं करते हैं। यह पूरी तरह कल्पना से परे है। जब हम कहते हैं, तो कहा जाता है कि यह न्यायिक सक्रियता और न्यायिक सीमा से बाहर है। हमें कार्यपालिका द्वारा बेवकूफ बनाया जा रहा है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से अतिरिक्त सालिसीटर जनरल एएनएस नाडकर्णी ने कहा कि अदालत को केन्द्र सरकार को बताना चाहिए कि इस कोष का कैसे और कहां इस्तेमाल होना चाहिए और इसका उपयोग कहां नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि धन का उपयोग नागरिक या नगर निगम कार्याें के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि करीब नब्बे हजार से एक लाख करोड़ रूपए की धनराशि थी जो अदालत के आदेशों पर केन्द्र सरकार और राज्य
सरकारों के पास विभिन्न मदों में रखी थी।

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– रवि कुमार विश्नोई
राष्ट्रीय अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
MD – www.tazzakhabar.com

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