बचाओ छठ-दुर्गा पूजा में डूबकर मरने वालों को

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उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही चार दिवसीय महापवित्र छठ पूजा संपन्न हो गई। सारे देश भर में छठ की छटा देखते ही बनती थी। और इससे कुछ समय पहले समाप्त हुई थी दीपावली और दुर्गा पूजा। पर इस बार भी इन पूजा समारोहों के दौरान नदी व तालाबों में नहाने या फिर मूर्ति के विसर्जन करने के क्रम में दर्जनों लोग डूब कर जन गवां बैठे। अकेले बिहार में छठ पूजा के दौरान तो डूबने से 73 लोगों की जानें चली गयीं। वास्तव में यह एक पर्व के लिए एक बहुत बड़ा आंकड़ा माना जाएगा।

अगर बात सिर्फ दिल्ली की ही करें तोदुर्गा पूजा के विसर्जन के दौरान करीब 10 लोग डूबे। बेशक, ये सभी दिल दिहलाने वाली घटनाएं हैं। ये उन तमाम सरकारी दावों-वादों की पोल भी खोलते हैं, जो संबंधित विभाग करते हैं इन पर्वों से पहले बड़ें जोरों से यह घोषणा करते हैं कि “सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम कर लिए गए हैं।” एक बात तो शीशे की तरह से स्पष्ट है कि अगरसरकारी इंतजाम ही पुख्ता होते और श्रधालु भी समझदारी का परिचय देते तो इतने अधिक लोगों की डूबने से जान न जाती।

उल्लास और मातम
जिनके परिवार के सदस्य डूब कर जन गंवा बैठे उनके परिवारों के उल्लास का माहौल घोर मातम में बदल गया। जिधर भी हादसे हुए वहां पर तो कोहराम मच गया। प्रसाद वितरण वगैरह का काम थम सा गया। जिलेवार बेगूसराय में पांच, वैशाली में पांच, पटना में आठ, अरवल में दो, कैमूर में दो, सारण में दो, रोहतास में दो तथा औरंगाबाद व नालंदा में एक-एक की मौत हो गयी। भागलपुर समेत कोसी, सीमांचल और पूर्वी बिहार के जिलों में छठ पर्व के दौरान डूबने से 26 लोगों की मौत हो गयी है। भागलपुर में 8, सहरसा में 5, मधेपुरा व पूर्णिया में एक-एक, अररिया में 2, खगड़िया में 6 और बांका में 3 लोगों के डूब कर मरने की दुखद सूचना है।

पूछे जाएंगे सवाल
वहीं, इन घटनाओं से प्रशासनिक तैयारियों पर भी सवाल उठने लगे हैं। सवाल तो पूछे ही जाएंगे। पूछे भी जाने चाहिए कि आखिर छठ के दौरान नदियों में सुरक्षा प्रबंध देखने वाले सरकारी विभाग अपने दायित्वों का निर्वाह करने से क्यों चूक गए? लेकिन, इस बाबत ईमानदारी से जांच करके दोषियों पर कठोरतम कार्रवाई हो। छठ से लेकर दुर्गा पूजा में मूर्तियों के विसर्जन के दौरान हुए हादसों के बाद तो यही कहने का मन कर रहा है कि हमारे देश में कोई भी पुरानी घटनाओं से सीख लेने के लिए तैयार नहीं है। क्या कभी हम सीख पायेंगें पुरानी गलतियों से? हमारे यहाँ तो हर साल होने वाले धार्मिकआयोजनों में हादसे होना अब सामान्य सी बात हो गई। इनमें हादसे बिलकुल ही न हों तो यकीन नहीं होता। शायद हमें बड़े आयोजनों की व्यवस्था करना सीखना होगा। अगर हमारे आयोजकों को यह आता तो हमारे यहां पर बार-बार हादसे तो नहीं होते न? क्या हमारे यहां पर किसी को बड़े आयोजन करने की तमीज नहीं है? पहली नजर में तो यही लगता है।

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संवेदनहीन होता समाज
दूसरी बड़ी बात यह है कि इन आयोजनों में शामिल होने वालों को भी सतर्क होना पडेगा। क्योंकि, ताजा सूरते हाल से तो यही लगता है कि हमारे यहां इस प्रकार के हादसे होते ही रहेंगे छठ से लेकर दूसरे बड़ें सार्वजनिक आयोजनों में। एक बड़ी संवेदनहीन स्थिति में यह देख रहा हूं कि इतने बड़े हादसे के बावजूद कम से कम मेरे गृह राज्य बिहार में कोई खास प्रतिक्रिया ही नहीं हो रही। छठ पर्व के बाद अब वैसे कहने को तो सब कुछ सामान्य गति से चलने लगा है। लेकिन, यह क्या हो गया है बिहार को? बिहारी समाज में एक प्रकार की सामाजिकता रही है। भाई-चारे का भाव रहा है। एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल होने की परम्परा रही है बिहारी समाज में। पर 73 लोगों की मौत के बावजूद बिहार शांत है। तो क्या यह मान लिया जाए कि बिहारी समाज की संवेदनशीलता अब पहले वाली नहीं रही। अब उसकी संवेदनाएं मर गईं क्या? सरकार के नियमानुसार मृतक के परिजनों को अनुग्रह अनुदान के रूप में चार-चार लाख देने का प्रावधान है। कई मृतकों के परिवारों को यह राशि उपलब्ध भी करा दी गई है।लेकिन, यह पर्याप्त तो नहीं है।

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अब राजधानी दिल्ली में दुर्गा पूजा विसर्जन का भी हाल जान लीजिए। इस साल करीब 8 लोगों की डूबने से मौत हो गई। गोताखोरों ने यमुना नदी से 7 के शव भी देरी से निकालीं गईं । सारे देश का हाल क्या होगा मालूम नहीं। लेकिन, यह सिलसिला भी लगातार जारी है।

मौतें और अंतरिम राहत
यह अब आम हो गया है कि हमारे यहां धार्मिक आयोजनों में डूबने तथा भगदड़ के कारण होने वाली मौतों पर अब सांकेतिक संवेदना मात्र व्यक्त कर ली जाती है। हादसे के चंदेक दिनों के बाद सब कुछ पुराने ढर्रे पर ही चलने लगता है। लेकिन, हादसों को रोकने की कोई ठोस पहल नहीं होती। दुर्भाग्य यह है कि इस तरह के बड़े आयोजनों में आने वाली भीड़ के प्रबंधन को लेकर कोई दीर्घकालीन नीति बनाने के संबंध में कोई विचार भी नही हो रहा है। यानी लोग मरते रहे, जांचें होती रहे और दे दी जाये मृतकों के परिजनों को कुछ अंतरिम राहत।

कैसे काबू हो भीड़
क्या भीड़ को नियंत्रण करना नामुमकिन काम है? जिसकी वजह से भीड़ में भगदड़ मच जाती है। अगर बात कुंभ जैसे बड़े आयोजनों की करें तो वहां पर एकत्र भीड़ को निकलने के पर्याप्त मार्ग ना मिलने के कारण ही मुख्य रूप से हादसे होते हैं। अब मानलीजिए कि हमारे प्रशासन को भीड़ को संभालना नहीं आता। इसका पुराना इतिहास है। सन 1956 में इलाहाबाद में चल रहे कुंभ मेले में आठ सौ तीर्थयात्रियों की भगदड़ में जान चली गयी थी। पहले ही चेतावनी दे दी गई थी कि ऐसे भीड़-भाड़ वाले मेलों में वीआईपी को नहीं जाना चाहिए। इसके बावजूद मेले में प्रधानमंत्री पंडित नेहरू आए। उनके आते ही भीड़ उन्हें देखने के लिए बेकाबू हो गई। मेला स्थल पर भगदड़ मच गई। इसके अलावा, बाद में जांच से मालूम चला कि नेहरु जी ने अखाड़ों से पहले स्नान करने का फैसला कर लिया था। इससे साधु नाराज हो गए। वहां हंगामा हो गया। उधर मौजूद हाथी भी भड़क गए। उन्होंने भी दर्जनों लोगों को कुचला। उसके बाद भी धार्मिक आयोजनों में वीआईपी पहुंचते रहे और भगदड़ से लोगों के मरने का सिलसिला जारी रहा। तब से लेकर अब तक प्रशासन ने कोई सबक नहीं सीखा। जब वीर बहादुर सिंह हरिद्वार के कुम्भ में स्नान करने गये तब हर-की-पौड़ी के अस्थायी पुलों से जा रही भीड़ को रोक दिया गया था और उन्हें यह बताया तक नहीं गया कि भीड़ को रोक क्यों दिया गया हैI भगदड़ मच गई और पचासों लोग दबकर मर गयेI 2013 में इलाहाबाद कुंभ में भी मौनी अमावस्या के दिन रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ में भी 150 से ऊपर लोग मरे थे। अब ये हादसे भी अब जनता की स्मृतियों से ओझल होते जा रहे हैं।

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हजारों की गई जान
अब देश को धार्मिक आयोजनों के दौरान भगदड़ और नदियों में डूबने के चलते होने वाली मौतों को रोकने के लिए कोई कार्य योजना तो बनानी ही होगी। भारत में बीते 70 सालों के दौरान हजारों मासूम लोग इन आयोजनों के दौरान अपनी जान गंवा बैठे हैं। क्या हम मान लें कि ये हादसे तो नहीं थमेंगे ? क्या छठ, दुर्गा पूजा या कुंभ जैसे आयोजनों से पहले होने वाली अफसरों की तैयारी बैठकों और वादों का कोई मतलब नहीं है ?

(लेखक राज्य सभा सांसद एवं हिंदुस्थान बहुभाषीय समाचार एजेंसी के अध्यक्ष हैं) – आर.के.सिन्हा

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