कानून और शांति व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों को नीली बत्ती लगाने की?

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दिल्ली 30 अप्रैल। पंजाब के सीएम अमरिंदर सिंह द्वारा मुख्यमंत्री का कार्यभार संभालने के तुरंत बाद अपने प्रदेश में लाल बत्ती के उपयोग पर लगाई गयी रोक के कुछ ही दिनों बाद प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा पूरे देश में कुछ आपात स्थिति से संबंध पुलिस अधिकारियों के अलावा सभी वाहनों पर लाल नीली बत्ती लगाये जाने पर पूर्ण रोक लगाई गयी।
लगभग डेढ़ साल से केंद्र सरकार की ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री आदि में इन बत्तियों को लेकर चल रहे विचार विमर्श के बाद लगायी गयी रोक का पूरे देश में हर वर्ग के नागरिकों द्वारा स्वागत किया गया यह वह बात और थी कि जिन्हें बत्ती लगाने का मौका मिल रहा था उन्होंने अपनी कुर्सी और पद बचाने के लिए इसका समर्थन किया तो आम आदमी द्वारा हूटर और बत्ती लगाकर रौब गांठने वालों से हो रही परेशानी से छुटकारा मिलने के लिए इस निर्णय का बढ़-चढ़ कर स्वागत किया गया था। और अगर देखा जाये तो यह फैसला था भी प्रशंसा योग्य।
मगर जैसे जैसे यह फैसला हुए समय बित रहा है तैसे तैसे यह महसूस किया जाने लगा है कि जिस प्रकार आपात स्थिति में पुलिसकर्मियों को गाड़ी पर बत्ती लगाने की छूट दी गयी थी उसी के तहत प्रशासनिक अधिकारियों को भी नीली बत्ती लगाने की छूट मिलनी चाहिए।
क्योंकि दूर दराज के ग्रामों से आने वाले सीधे सच्चे गांववासी जब कलैक्टर या किसी प्रशासनिक अधिकारी से मिलने पहुंचते है तो इसका पता कि अधिकारी है या नहीं ज्यादातर मामलों में निवास और कार्यालय के बाहर खड़ी उनकी गाड़ी पर लगी नीली बत्ती से ही उन्हें लगता है वरना कर्मचारी टालने के लिए यह कह देते है कि साहब अभी कहीं गये हुए है। कुछ घंटे बाद शाम को या कल आना और क्योंकि हर व्यक्ति अभी हमारे देश में साक्षर है नहीं इसलिए वह अफसरों की गाड़ियों के नम्बर भी याद नहीं रख पाता है। इस बात आजकल आम आदमी को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
दूसरी ओर पुलिस के अफसरों के साथ तो पूरी सिक्योंटी और सुरक्षा व्यवस्था चलती है तो उससे भी यह एहसास हो जाता कि यह कोई अधिकारी और इस मामले में उनकी वर्दी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है मगर तहसीलदार से लेकर कलक्टर और कमिश्नर तक अगर किसी कठिन परिस्थिति में कहीं पहुंचते है तो उनकी पहचान कि यह अफसर है नीली बत्ती से ही लग पाती है क्योंकि तहसीलदार के साथ तो शायद सिपाही भी नहीं होता है और बाकी कलक्टर, और एसडीएम के साथ एक गनर नजर आता है और कहीं बहुत ही महत्वपूर्ण बात हुई तो डीएम साहब के साथ दो-तीन पुलिसकर्मियों की गारद कमिश्नर के समान लगा दी जाती है। लेकिन क्योंकि इतनी गारद कई जनप्रतिनिधियों के साथ भी होते है इसलिए वह आने वाला अधिकारी है या जनप्रतिनिधि पता नहीं चल पाता।
जनता के बीच से उभर रही ऐसी समस्याओं से यह आभास होता है कि पीसीएस और आईएएस अफसरों के साथ साथ कुछ और जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों जिनका संबंध शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने से होता है उन्हें नीली बत्ती लगानी की अनुमति जनहित में दी जानी चाहिए।
बीते दिनों उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों के पीसीएस अधिकारियों की एसोसिएशनों के पदाधिकारियों द्वारा तो कुछ बिन्दु उभर कर अपनी गाड़ियों पर नीली बत्ती लगाने की अनुमति देने की मांग भी मुखर की गयी। अभी शासन और सरकार के समक्ष यह पहुंची है या नहीं वह तो एक अलग बात है। लेकिन जनता भी चाहती है कि प्रशासन से सीधे जुड़े अफसरों को उनके सरकारी वाहनों पर नीली बत्ती लगाने की छूट सरकार जरूर दे।
यहां वह बात और है कि अभी आईएएस अधिकारियों की ओर से या उनके एसोसिएशनों ने ऐसी मांग नहीं की है मगर आम आदमी सोचवता है कि देश के हर जिले में एसडीएम से लेकर कलक्टर और मंडल स्तर पर कमिश्नर और अपर आयुक्तों को यह सुविधा जल्द से जल्द मिलनी चाहिए जिससे सीधे सच्चे नागरिकों को अपनी समस्या से संबंध अफसर को ढूंढने में कोई कठिनाई न हो।

-रवि कुमार विश्नोई
संस्थापक व राष्ट्रीय सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना

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