पुरातन कला और संस्कृति को समेटे हुए है हम्पी

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कर्नाटक के बेल्लारी जिले में स्थित हम्पी की कला और संस्कृति आज भी अपने वैभव को समेटे हुए है। कभी राजा कृष्णदेव राय का राज्य रहे हम्पी में मौजूद तत्कालीन पुरातत्व अवशेष उस दौरान की संस्कृति और कला की अद्भुत कहानी कहते हैं। मध्य युग में दक्षिण भारत में एक विशाल राज्य था। इस राज्य की राजधानी विजयनगर या वर्तमान हम्पी थी। विजयनगर में हीरे−जवाहरात, मणि−मुक्ता खुले रूप से बिका करते थे। विजयनगर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का केन्द्र था। वहां विश्व भर के व्यापारी सामान बेचने खरीदने आते थे। 33 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले विजयनगर की जनसंख्या पांच लाख से अधिक थी। सुरक्षा के लिए इसे सात दीवारों से घेरा गया था।
चौदहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में 336 इस्वीं में तुंगभद्रा के तट पर हरिहर और बुक्का नाम के दो भाइयों ने एक राज्य, विजयनगर की स्थापना की। यह राज्य कृष्णादेव राय के शासनकाल के दौरान उन्नति के चरम शिखर पर जा पहुंचा। दक्षिण के पांच सुलतानी राज्यों के साथ विजयनगर को अनेक लड़ाइयां लड़नी पड़ीं। बहमनी के शासकों ने छह बार विजयनगर पर घेरा डाला लेकिन उसे कभी जीत न सके। कृष्णा देव राय का दामाद आलिया राम राय एक अत्यंत महत्वाकांक्षी, कुटिल और धूर्त व्यक्ति था। कृष्णा देव राय के पुत्र अन्युत राय की मृत्यु के बाद वह विजयनगर का सर्वेसर्वा बन गया।

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आलिया राय दक्षिणी सुलतानों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता था। वह एक सुलतान को दूसरे से लड़वाता था। उसके निरंकुश व्यवहार और अनुचित मांगों ने दक्षिण के पांचों सुलतानों को एक कर दिया और उन्होंने आलिया राय को दंड देने के लिए एक विशाल संयुक्त सेना के साथ विजयनगर पर हमला किया। सक्षमी तागडी तालीकोट के निर्णायक युद्ध 1565 में राम राय पकड़ा गया और मारा गया। विजयी सेना ने अनेगोड़ी को आधार बना कर विजयनगर को छह महीनों तक इतना लूटा खसोटा कि इटालियन यात्री कैसारो डरिसी को दो वर्ष बाद इस नगर में केवल दो जंगली जानवर मिले।

इसके बाद उजाड़ वीरान और उपेक्षित विजयनगर गुमनामी के अंधेरे में गायब हो गया। उसकी ध्वस्त इमारतों को मिट्टी की चादर ने ढक लिया। तालीकोट की लड़ाई की याद धूमिल होने के बाद समीपवर्ती गांवों के लोगों ने खेती योग्य जमीन पर गन्ना, केले, नारियल और धान लगाना शुरू किया। यदि सन् 1800 ईस्वीं में ईस्ट इंडिया कंपनी के सर्वेयर जनरल कोचिन मैकेंजी इसका पता न लगाते तो हम्पी गुमनामी के अंधेरे में गायब रहता। कालांतर में इसे संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया। लेकिन काफी समय तक इसके पुनरुद्धार की दिशा में विशेष कुछ नहीं किया गया।

अस्सी के दशक के बाद हम्पी के पुनरुद्धार और प्राचीन गौरव को फिर से प्रकट करने का काम कर्नाटक सरकार, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग और कर्नाटक सरकार एवं भारत सरकार के पर्यटन विभाग ने शुरू किया। हम्पी को विश्व विरासत स्थल भी घोषित किया गया है। वर्तमान हम्पी उत्तर भारत के सुलतानों की राजधानी की तरह विजयनगर एक विशाल नगर था। समीपवर्ती उपनगरों और सैनिक छावनियों को मिलाकर इसकी जनसंख्या दस लाख के आसपास थी।

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हम्पी के अवशेष आज भी पर्यटकों, सैलानियों, इतिहास और पुरातत्व के छात्रों और आम जनता को आकर्षित और सम्मोहित करते हैं। हम्पी के अवशेषों में एक रहस्यात्मकता है, एक जादुई प्रभाव है, जो पर्यटकों पर स्थायी प्रभाव छोड़ जाता है। हम्पी के अवशेष लगभग 500 इमारतें−30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हैं।

इस समूचे क्षेत्र को एक दिन में पैदल नहीं देखा जा सकता। हम्पी को देखने, समझने और उसके प्राचीन वैभव एवं गौरव को आत्मसात करने का सर्वोत्तम तरीका उसे दो−तीन दिन में घूम−घूम कर पैदल देखना है। समयाभाव होने पर उसे कार से एक दिन में भी देखा जा सकता है।
हम्पी की यात्रा सुविधानुसार हम्पी बाजार या कमला पुरम गांव कहीं से भी शुरू की जा सकती है। हम्पी बाजार से सभी प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों को देखते हुए कमला पुरम के समीप संग्रहालय में पहुंचा जा सकता है। पुराना हम्पी बाजार अब एक व्यस्त गांव है। पुराने बाजार की इमारतों पर कब्जा करके स्थानीय लोगों ने उसका स्वरूप बदल दिया है।

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गांव का प्रमुख दर्शनीय स्थल 52 मीटर ऊंचा, सात गोपुरम और भव्य प्रवेश द्वार वाला विरूपाक्ष शिव मंदिर है। यह तमिलनाडु के अन्य मंदिरों की शैली में बना है। विरूपाक्ष मंदिर से कुछ दूरी पर हम्पी की प्रसिद्ध लक्ष्मीनरसिंह की मूर्ति है। सिंह की आकृति वाली यह मूर्ति कुंडली मारे अनन्त नाग पर बैठी है। मूर्ति के बाएं भाग में लक्ष्मी की मूर्ति थी, जो नष्ट हो गई। इसके बावजूद यह मूर्ति भय पैदा करती है।

हम्पी बाजार के सिरे से दो किलोमीटर दूर विट्ठल विठावा का मंदिर है। इसकी अद्भुत नक्काशी और जीवंत मूर्तियां विजयनगर की कला का सर्वोत्तम उदाहरण हैं। इसका निर्माण 1442 में देवराय द्वितीय ने कराया था। इसके मंडप के स्तम्भों को संगीत स्तम्भ भी कहते हैं, क्योंकि उनमें थाप देने पर संगीत की मधुर ध्वनि निकलती है। मंदिर के स्तम्भों पर घोड़ों और जीव−जन्तुओं की आकृतियां इतनी बारीक और जीवंत बनाई गई हैं कि बस देखते ही बनता है। मंदिर के समीप अत्यधिक कलात्मक एक पत्थर का रथ है। इस रथ के पहिये अपनी धुरी पर घूमते हैं।

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