कांग्रेस के लिए शीला दीक्षित को यूपी में मुख्य मंत्री के रूप में पेश किया जाना कही जल्दबाजी का निर्णय साबित ना हो

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कांग्रेस ने काफी प्रतीक्षा के बाद फिल्म अभिनेता और उतराखंड से राज्य सभा सदस्य राज बब्बर को यूपी का कांग्रेस प्रेसीडेंट सांसद संजय सिंह को प्रचार मंत्री बनाकर जो कार्यकर्ताओं में जान फूंकने का काम किया था उसका असर अभी पूरी तौर पर शुरू भी नही हुआ था की आम कांग्रेसी के विचार में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को यूपी में मुख्यमंत्री का प्रत्याक्षी बनाकर उतार दिया। शायद कांग्रेस हाई कमांड को लगता है की पंजाबी और ब्रहामण का ताल मेल 2017 के चुनाव में कोई बहुत बड़ा करिश्मा कर सकता है लेकिन जहां तक मै समझता हुं ऐसा होना सम्भव नही लगता है।
क्योकि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता शीला दीक्षित एक तो वृद्ध हो गयी है दुसरे दिल्ली में ही वो अपनी पकड़ कांग्रेस कार्यकर्ताओ पर मजबूत नही रख पायी तो यूपी से तो सीधा राजनीति से उनका कोई लेना देना नही है और ना ही यहां के कार्यकताओं से उनका कोई विशेष सम्पर्क कहा जा सकता है।
अच्छा तो यह होता की राज बब्बर को अध्यक्ष बनाने के बाद नेताओं को कार्यकर्ताओं की मंशा जानने के लिए उनकी नब्ज टटौलनी चाहिए थी और पहले से संजय सिंह को प्रचार की कमांड सौप सांसद नेता की राजबब्बर से जुगल बंदी का असर देखना चाहिए था उसके बाद यूपी के कार्यकर्ताओं  का एक सम्मेलन लखनऊ में कराकर उनकी राय जाननी चाहिए थी की मुख्य मंत्री के रूप में किसे पेश किया जाये बाद में चाहे हाई कमान उनहे संतुष्ट कर अपना निर्णय ही लागु करती तो कम से कम युपी के बहुत दिनों से उपेक्षित चल रहे नेताओं को कार्यकर्ताओं को यह तो महसुस होता की निर्णय उनसे पुछकर लिया गया है। मगर वर्तमान मे हाईकमान के निर्णय से कही ऐसा ना हो की राजबब्बर और अन्य नेताओं के आकर्षण में भीड़ तो जुटती रहे लेकिन चुनाव में कांग्रेसी वोट डलवाने के समय हतोंउत्साहित ना हो जाये। कुल मिलाकर शीला दीक्षित को उतारना कांग्रेस नेताओं का जल्दबाजी में लिया गया निर्णय भी साबित हो सकता है।

-रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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