अखबारों से समाचार उठाना पाठकों के हित में भैया हम तो चुराकर छापते हैं खबरें!

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वर्तमान सरकारी उत्पीड़न के बावजूद जिस प्रकार मीडिया दिन प्रतिदिन सशक्त हो रहा है उसी प्रकार इससे जुड़े कुछ लोगों में चाहे वो पत्रकार हो या संपादक अथवा अखबारों के संचालकों में एक दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में समय असमय स्थानीय जगह कोई भी हो वहां यह बात कहते आए दिन सुना जा सकता है कि फला समाचार उसका था उसने चुराकर छाप दिया या उसने उठाया और उस पर अपना नाम डालकर आगे बढ़ा दिया।
ऐसा कहने वाले अपने मामले में कितने ईमानदार हो सकते है। यह तो वो भी नहीं जान सकतें। क्योंकि पत्रकारिता क्षेत्र के 40 साल के तर्जुबे में जो दिखाई दिया वो यह है कि समाचार कोई पैदा तो होते नहीं। जो भी है वो सबके सामने रहते हैं और जब से इलक्ट्रोनिक चैनल और फिर सोशल मीडिया अस्तित्व में आया तब से तो कोई भी यह नहीं कह सकता कि फला समाचार उसने विकसित किया था। या तैयार। क्योंकि छोटी से छोटी बात दुनियाभर में सोशल मीडिया पर कुछ मिंटो में आग की तरह फैलती हैं। तो फिर खबर किसी से भी छुपी कैसे रह सकती हैं। हां यह बात और है कि एक खबर किसी ने चलाई और पता दूसरे को भी था। उसने भी खबर में कुछ बदलाव कर उसे पाठकों के सामने अपने माध्यम और व्यवस्था से परोस दिया। और इसे लेकर कुछ तथाकथित स्वंयभू इतराकर जगह जगह यह कहने लगे कि फला समाचार तो मैरा था उसने चुराकर छांप दिया।
अब भैया अगर सही मायनों में देखे तो हमारे जैसे अन्य समाचार पत्र संचालक क्या करते हैं क्या नहीं। वो तो हमे नहीं पता। लेकिन हम तो अपने संस्करणों में काफी प्रतिशत समाचार और अखबारों से चुराकर ही प्रकाशित करते हैं। हां यह जरूर है कि उनके बारे में तथ्य और बिंदुओं की जानकारी करने का प्रयास जरूर करते हेै वरना पाठकों की जानकारी और उनके हित के लिये तमाम खबरें इधर उधर से लेकर छांपी जाती हैं। हां उनमे यह बेईमानी नहीं की जाती कि खबर किसी की हो और नाम हम अपना या किसी अपने संवाददाता का लगा दें। अगर समाचार जनहित व राष्ट हित का है तो निस्वार्थ भावना से उसे अपने यहां भी प्रकाशित जनहित में कर देने से नहीं चूकते।
कुछ वर्ष पूर्व केंद्र में सुसमा स्वराज जी सूचना मंत्री थी तब डीएवीपी द्वारा एक रूपता के नाम पर कई सौ अखबारों की विज्ञापन मान्यता निरस्त कर दी गई थी उस समय दिल्ली से प्रकाशित डे आफटर पत्रिका के संपादक श्री सुनील ढाग के माध्यम से केंद्रीय सूचना राज्यमंत्री रमेश बेंस से शास्त्री भवन में दिन में तीन बजे दिल्ली पे्रेस के के प्रेशनाथ की अध्यक्षता में एक प्रतिनिधि मंडल ने मुलाकात की थी जिसमे दैनिक केसर खूशबु टाईम्स के संपादक रवि कुमार विश्नोई द्वारा 21 बिंदुओं से संबंध समस्याओं को सूचना मंत्री के सामने रखकर एक सवाल पूछा गया था कि अगर आप कहीं कोई संबोधन करते हैं अथवा सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं के बारे में कुछ बोलते हैं तो उस समाचार को हम कितने प्रकार से छाप सकते है तब श्री बेंस का कहना था कि एक ही प्रकार से छपेगा अगर कोई उसमे बदलाव करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। और इसी बिंदु पर जितने समाचार पत्रों की मान्यता एकरूपता के नाम पर निरस्त की जा रही थी वो डीएवीपी के अधिकारियों को बहाल करनी पडी।
कुछ ऐसा ही सब समाचार में होता है। 95 प्रतिशत समाचार एक ही होते हैं। हां छापने वाले उन्हे अलग अलग तरीके से विस्तार देते हैं। फिर उसे अपना समझते हुए ओरों पर बडी मस्ती में यह
आरोप लगाते हैं की उन्हेांने हमारा समाचार चोरी कर लिया।
तो ऐसी चर्चा करने वालों से तो मैं यही कह सकता हूं कि भाई कोई जो करता होगा चोरी छुपे या खुलकर वो तो वहीं जाने हम तो ख्ुालेआम विभिन्न समाचार पत्रों से जन व राष्ट्रहित की खबरे चुराते हैं और अपने यहां छांपते हैं। इसे आप खबर का उठाना भी कह सकते हैं और चुराना भीं । लेकिन हमें यह बात कबूल ने में कोई हर्ज इसलिये महसूस नहीं होता कि हम तो अपने
समाचार पत्रों में खुलकर छांपते हैं कि हम पाठकों के हित में जन उपयोग की खबरें विभिन्न
अखबारों से लेकर प्रकाशित करते हैं ।
हां यह जरूर कह सकता हूं कि जो लोग खबरे चोरी करने या उठवाने और उसमे बदलाव करने की बात करते हैं और अगर उनमे हिम्मत है वो यह दावा करें कि उन्होंने कभी किसी ओर की खबर को उठाकर विस्तार नहीं दिया। या वो सभी समाचार खुद पैदा करते हैं।
ऐसा मैं इसलिये कह सकता हूं पूर्व में दिल्ली टाइम्स फिल्म आदि में ऐसा हो सकता है कि घटना होने से पहले उससे संबंध खबर छांप दी जाए और फिर घटना को अंजाम दिलवाया जाए । मगर प्रैक्टिकल में ऐसा संभव नहीं हैं। तो भैया अपने मिया मिठठू बनने वालो दूसरो की तरफ समाचारों को लेकर भी पूर्व आदि में उंगूली उठाने से पहले यह जरूर सोच लों कि अगर एक उंगूली उधर कर रहे तो चार तुम्हारी तरफ भी उठ रही हैं।मजे की बात ऐसे मामलों में यह देखने को मिलती है कि जो असफलता के प्रतीत मीडिया से जुड़े कुछ लोग इस प्रकार की बात करते हैं उन्हे पढे लिखे होने के बाद भी
समाचार लिखने का ज्ञान ज्यादातर को नहीं होता। मगर मैं सीना ठोककर यह कह सकता हूं कि निरक्षर होने के बाद भी ज्यादातर समाचार सही बनवाने और लिखवाने में किसी से पीछे नहीं हूं हां पाठकों की बढ़ती नई नए समाचारों की मांग को ध्यान में रखते हुए अनेक
अखबारों से खबरों तो उठाने कह लो या चुरा वो तो लेनी ही पढ़ती हैं ।
रही बात यह कि कोई व्यक्ति कितने भी अखबार पढ़ता होंगा वो यह अच्छे प्रकार से जानता होगा कि सारे समाचार किसी भी एक अखबार में नहीं मिल सकतें। सब अखबारों में पढने को कुछ समाचारों को छोड़कर अलग अलग ही होते हें। ऐसे में पाठकों की खबर पढने की भूख को मिटाने के लिये भी कई प्रकार से समाचारों का संकलन करना समय की मांग बन गई है। इसलिये कोई कुछ भी कहे लेकिन एक दूसरे के संस्करणों में से खबरे लेना एक आम बात है जो समाप्त नहीं हो सकती।

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– रवि कुमार विश्नोई
राष्ट्रीय अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
MD – www.tazzakhabar.com

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