समलैंगिकता पर संविधान पीठ का निर्णय है स्वागत योग्य

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नवतेज सिंह जौहर की याचिका पर उनके वकील अरविंद दातार द्वारा कहा गया कि इस मामले में दंडनीय प्रावधान असंवैधानिक है। क्योंकि इसमे परस्पर सहमति से यौन संबंध बनाने वाले वयस्कों पर मुकदमा चलाने और सजा देने का प्रावधान है। इसलिये यौन संबंधों को अपराधों की श्रेणी से बाहर किया जाए। मामले का संज्ञान लेते हुए प्रधान न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की तीन सदस्य पीठ ने कहा कि आईपीसी की धारा 377 से उठे इस मसले पर वृहद पीठ द्वारा विचार करने की आवश्यकता है। दूसरी तरफ अधिवक्ता अरविंद दातार ने कहा कि आप सहमति से आप्रकृतिक यौन संबंध स्थापित करने वाले दो वयस्कों को जेल में बंद नहीं कर सकते। इसके साथ ही उन्होंने अपनी दलील के समर्थन में नौ सदस्यीय संविधान पीठ की उस व्यवस्था का भी हवाला दिया जिससे निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया गया है। उनका तर्क था कि यौनाचार के लिये अपने साथी का चयन करना मौलिक अधिकार है। कानून के विद्वानों का मानना है कि धारा-377 को अंग्रेजों ने 1862 में लागू किया था। इसके तहत किसी पुरुष, महिला या जानवर के साथ अप्राकृतिक सेक्स अपराध है।
अगर कोई स्त्री-पुरुष आपसी सहमति से भी अप्राकृतिक संबंध बनाते हैं तो इस धारा के तहत 10 साल कैद की सजा व जुर्माने का प्रावधान है। इस धारा के तहत गिरफ्तारी के लिए वारंट की जरूरत नहीं होती है। धारा-377 एक गैरजमानती अपराध है। गत वर्ष अगस्त माह में निजता को मौलिक अधिकार करार दिए जाने वाले नौ सदस्यीय संविधान पीठ के फैसले में भी समलैंंिगकता को अपराध की श्रेणी में लाने पर सवाल उठाए गए थे। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड ने तो कहा था कि दिसंबर 2013 के आदेश को दरकिनार कर दिया जाना चाहिये। सुप्रीम कोर्ट के समलंैगिकता को अपराध की श्रेणी में रखने के अपने आदेश पर पुनर्विचार का स्वागत करते हुए कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने कहा कि आधुनिक भारत और 21वीं सदी में इस तरह के कानून की कोई जगह नहीं है। भरत नाटयम डांसर नवतेज सिंह आउटलुक के पूर्व संपादक सुनील मेहरा, नीमराणा में होटल मालिक अमननाथ, दीवा ग्रुप आॅफ होटल्स की रितु डालमिया और रेस्तरा मालिक आयशा कपूर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर के अलावा देशभर के पांच समलैंगिक समुदायों ने दायर की थी कोर्ट में याचिका।
अपने मूल अधिकारों का हनन बताते हुए। 2013 में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को बदलते हुए सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग समलैगिंगकों के शारीरिक संबंधों को अवैध करार दिया था। क्योंकि मामला माननीय न्यायालय में विचाराधीन है और अब इस विषय पर पुनर्विचार की बात चल रही है।
ऐसे में एक स्वतंत्र देश का नागरिक होने के नाते मुझे भी अपनी बात कहने में कोई हर्ज नजर नहीं आ रहा है मैं इस फैसले का स्वागत करते हुए इस से संबंध याचिका पर खुले मन से समाज में विचार किये जाने की बात महसूस करता हूं। माननीय न्यायालय जो भी फैसला दें वो अलग बात है लेकिन फिलहाल जब हम हर क्षेत्र में नागरिक अधिकारों और उन्हे बोलने की आजादी देता है तो मुझे लगता है कि समाज के एक बड़े हिस्से से जुड़े इस तथ्य पर भी सरकार को विस्तार से चर्चा कराकर कोई निर्णय जल्द लेना चाहिये। मैं किसी भी प्रकार की समलैंगिकता का पक्षधर तो नहीं है हूं लेकिन मुझे लगता है कि इस विषय को लेकर किसी को दंड दिया जाना बिना विचार किये समाज के लिये ठीक नहीं है।

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– रवि कुमार विश्नोई
राष्ट्रीय अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
MD – www.tazzakhabar.com

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