आॅल इंडिया न्यूज पेपर एसोसिएशन आईना की मांग, मीडिया में फर्जीवाड़ा रोकने के लिये पत्रकार और पत्रकारिता को किया ही जाना चाहिये परिभाषित

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पत्रकारों के लिये कानून की रूपरेखा बनाने के लिये बनी विशेषज्ञों मंत्रियों को मेरा सुझाव है कि फर्जी पत्रकारों की बढ़ती फौज को रोकने के लिये और सही मायनों में जो पत्रकार है उन्हे सम्मान व उनका अधिकार दिलाने के लिये पत्रकार कौन है इसकी परिभाषा तो तय होनी चाहिये। आॅल इंडिया न्यूज पेपर एसोसिएशन आईना की इस मांग से मैं भी सहमत हूं कि कानून की रूप रेखा बनाने के लिये बनी समिति इस क्षेत्र में पारदर्शीता ईमानदारी को बढ़ावा देने के लिये यह भी तय करे कि पत्रकार बनते समय एक शपथ पत्र लिया जाए कि वो अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वाह और पत्रकारिता के उददेश्य का पालन करेंगे। अपने स्वार्थ के लिये उनके द्वारा समाचार पत्र संचालकों को किसी भी रूप में बदनाम नहीं किया जाएगा। और आम आदमी के उत्पीड़न में उनकी सहभागिता
बिलकुल नहीं रहेगी और वो हमेशा समाज की कुरूतियों और समाज में सुधार के लिये प्रयास करते रहेंगे।
देश में डाटा सुरक्षा के लिए कानून की रूपरेखा बनाने के लिए नियुक्त विशेषज्ञ की समिति का कहना है कि यह स्पष्ट होना चाहिए कि पत्रकार कौन हैं और पत्रकारिता का कार्य क्या है।कमेटी ने यह सलाह पत्रकारिता/साहित्यिक उद्देश्यों और शोध को डाटा सुरक्षा कानून से छूट देने की बात करते हुए दी है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बी.एन. श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में बनी 10 सदस्यीय समिति ने एक श्वेतपत्र इलेक्ट्राॅनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भेजा गया है। यह श्वेतपत्र सार्वजनिक परामर्श के लिए जनता के सामने भी रखा गया है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि पत्रकार कौन हैं, इसे परिभाषित करने के प्रयास पत्रकारीय स्वायत्तता में कटौती कर सकते हैं।सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता माधवी दीवान ने कहा कि कई कानूनों में यह पहले से ही परिभाषित है कि पत्रकार कौन हैं। यदि इस परिभाषा में कोई कटौती की गई तो इसका अभिव्यक्ति की आजादी पर बहुत विपरीत असर होगा। ‘वर्किग जर्नलिस्ट एक्ट’ में पत्रकार वह है जो जिसका मुख्य व्यवसाय पत्रकारिता है और जो किसी न्यूज पेपर या न्यूज एजेंसी में कार्यरत है। अन्य कानूनों में भी इसी एक्ट से पत्रकारिता की परिभाषा को लिया गया है। सूत्रों का मानना है पत्रकार की परिभाषा को और विस्तृत करने की जरूरत है।

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मृतक परिवार को 5 करोड़ रूपये, घर के सदस्य को नौकरी दें सरकार
त्रिपुरा में स्टेट राइफल्स टीएसआर के कांस्टेबल की गोली से मारे गए पत्रकार सुदीप दत्त भौमिक व यूपी के गाजीपुर जिले के करण्डा थाना क्षेत्र के ब्राहमणपुरा में पत्रकार राजेश मिश्रा की गई हत्या से यह स्पष्ट होता है कि समाज की बुराईयों और मठाधीशों की करतूतों को उजागर करने के चलते पत्रकार अब अपनी जान हथेली पर रखकर घूमने पर मजबूर हैं। और उन्हे विभिन्न क्षेत्रों के माफियाओं के खिलाफ आवाज उठाने से उत्पन्न खतरों को ध्यान में रखकर सरकार, शासन, प्रशासन और पुलिस द्वारा कोई सुरक्षा उपलब्ध नहीं करायी जा रही। और कई मौको पर देखने में आता है कि उनकी सुनवाई भी अधिकारियों व थानों में नहीं होती। विभिन्न कारणों से त्रस्त पत्रकारों की बातों पर ध्यान देने के बजाए जिम्मेदार अफसर और जनप्रतिनिधि उसे मजाक में उड़ा देते हैं।

परिणाम स्वरूप पहले से अत्यंत व जोखिम भरा यह कार्य कुछ जनप्रतिनिधियों, अफसरानों, विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय माफियाओं तथाकथित समाज सेवकों के बीच बढ़ते गठबंधन के कारण और भी खतरनाक हो गया है। आॅल इंडिया न्यूज पेपर एसोसिएशन आईना की इस मांग से मैं भी सहमत हूं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह जी से देश भर में इच्छा व्यक्त करने पर लघु व भाषाई समाचार पत्र संचालकों पत्रकारों को शस्त्र लाईसेंस और सुरक्षा उपलब्ध कराने के अतिरिक्त उनकी हत्या होने अथवा घायल कर दिये जाने पर मुआवजा देने की व्यवस्था केंद्र सरकार स्वयं अथवा राज्य सरकारों के सहयोग से मृतक पत्रकार के परिवार को पांच करोड़ की धनराशि और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का कानून बनाए यह भी तय करे कि घायल होने पर पत्रकार के पूर्ण इलाज की निःशुल्क व्यवस्था हो और जब तक वो ठीक नहीं हो जाता तब तक हर माह उसके परिवार को 50 हजार की सहायता राशि उपलब्ध करायी जाए। इसके अतिरिक्त यह भी तय किया जाए कि जिस जिले में पत्रकारों का उत्पीड़न होने की शिकायत मिले या होता पाया जाए तो वहां के डीएम, एसएसपी के खिलाफ कार्रवाई और स्थानीय थानेदार की सेवाएं समाप्त की जाए।

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अखबारों से हटायी जाए जीएसटी, फरवरी के बजट में लघु व भाषाई समाचार पत्रों के लिये निर्धारित हो अलग से बजट

इस बार सरकार अगला आम बजट फरवरी माह में लाने की तैयारी कर रही है। यह सरकार का अधिकार है कि वो कब बजट को पेश करे और कब नहीं। मगर आल इंडिया न्यूज पेपर एसोसिएशन आईना की इस मांग से मैं भी सहमति व्यक्त करता हूं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली जी बजट फरवरी में पेश करें या किसी और समय में लेकिन भाषाई व लघु समाचार पत्रों के संचालकों के आर्थिक, मानसिक, समाजिक उत्पीड़न का कारण बन रही जीएसटी को अखबारों से तुरंत हटाया जाए। क्योंकि यह लोकतंत्र पर कुठाघात के समान है। इससे कई समाचार पत्र संचालक देशभर में अपने समाचार पत्र बंद करने या फिर कुछ ओर सोचने के लिये जो नहीं सेाचा जाना चाहिये की स्थिति में पहुंच गए हैं इसलिये जीएसटी तुरंत हटायी जाए।

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पीएम साहब और वित्ती मंत्री अरूण जेटली, तथा सूचना मंत्री स्मृति ईरानी और राज्यमंत्री राज्य वर्धन राठौर जी देशभर में समसाचार पत्रों में छपवाए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों के लिये निर्धारित बजट में से लघु व भाषाई समाचार पत्र संचालकों के लिये विज्ञापन बजट अलग से आरक्षित किया जाए और यह तय हो की इन समाचार पत्रकारों के लिये निर्धारित लिये किसी भी बड़े अखबार को विज्ञापन के रूप में न दिया जाए। नरेंद्र मोदी जी जब आप केंद्र में पीएम बनते ही तो यह लगा कि लोकतंत्र में और मजबूती लघु और भाषाई समाचार पत्रों के संचालकों को मिलेगी मगर पिछले तीन साल में इन समाचार पत्र के संचालक किसानों की तरह आत्महत्या करने की स्थिति में पहुंच चूके हैं। अभी क्योंकि आप हर क्षेत्र में कमजोर वर्ग को उभारने का प्रयास कर रहे हैं इसलिये आपसे इस वर्ग के अखबार संचालकों को बढ़ी उम्मीद है कि आप इनके लिये कुछ नया करेंगे इसलिये अभी तक किसानों की भांति इनके आत्महत्या करने की खबरें आप तक नहीं पहुंच रही है। इन सभी बिंदुओं को देखते हुए अनुरोध है कि विशेष रूप से आप अखबारों पर लगी जीएसटी हटवाने के साथ साथ फरवरी में पेश होने वाले बजट में लघु व भाषाई समाचार पत्र संचालकों व उनसे जुड़े पत्रकारों द्वारा समाज उत्थान में किये जा रहे कार्याें को दृष्टिगत रख कुछ विशेष व्यवस्था और सुविधा देने की पहल करायी जाए। आॅल इंडिया न्यूज पेपर एसोसिएशन आईना आपका अभारी होगा। इसके सदस्यों को आपसे बड़ी उम्मीद है।

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