राहुल गांधी का कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना तय गुजरात चुनाव परिणाम का कुछ भी हो, 2019 के लोकसभा चुनाव में चल सकती है राहुल की लहर

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देश के दो सबसे बड़े राजनीतिक दलों मंे से एक कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिये आज राहुल गांधी द्वारा पार्टी के बड़े नेताओं की मौजूदगी मेें नई दिल्ली स्थित कार्यालय में अपना नामांकन किया गया। क्योंकि तय समय साढ़े तीन बजे तक इस पद के लिये सिर्फ एक नाम ही आया। और वो भी उनका था इसलिये।
घोषणा भले ही 11 दिसंबर को शाम पांच बजे के बाद हो लेकिन उनका कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना पूरी तौर पर 100 प्रतिशत तय है। लोकसभा सदस्य और वर्तमान पार्टी के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी का नामांकन की अध्यक्ष बनने के लिये ऐसे समय में हो रहा है जब केंद्र में भाजपा और उसके सहयोगी दलों की सरकार है तो देश के अनेक प्रदेशों में भी भाजपा सरकार काबिज है।
और चारों ओर से जितने भी कांग्रेस विरोधी है वो सब। राहुल गांधी की रणनीति और राजनीतिक समझ पर हल्ला बोलने का कोई मौका नहीं चूक रहे है। मगर अब उनके आक्रामक तेवर को देखकर उन्हे पप्पू कहने वाला तो अब कोई दिखाई नहीं देता हैं लेकिन कोई रजिस्टर में नामांकन को लेकर हिंदू के नाम पर उन्हे विवादित बनाने की कोशिश कर रहा है तो कोई मंदिरों में जाने को लेकर टिप्पणी करने में लगा हैं सत्ताधारी पार्टी के सभी नेता एकजुट होकर गुजरात चुनाव में कांग्रेस को पराजित करने के लिये राहुल गांधी और कांग्रेस पर राजनीतिक हमला करने में कोई चूक नहंी कर रहे है।
यह कहने में मुझे कोई हर्ज महसूस नहीं हो रहा है कि भाजपा उप्र में हुए निकाय चुनावों में मत प्रतिशत मिलने को लेकर बुरी तरह आहत होने के बाद भी गुजरात चुनाव में यूपी के नगर निगमों के चुनाव परिणामों का ढिंढोरा पीटकर देश में अपनी लहर होने का सपना दिखा रही है। वहां क्या होगा राहुल गांधी के अध्यक्ष के रूप में गुजरात चुनाव परिणाम क्या होंगे यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन गुजरात परिणाम को लेकर राहुल गांधी को राजनीतिक कसौटी और उनकी नीतियों को
कमजोर करकरे किसी को नहीं आंकना चाहिये और जो ऐसा करने की सोचते हैं उन्हे देश में 1977 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाई गई इमरजैंसी के बाद जब वो समाप्त हुई सभी विपक्षी दलों ने एक होकर लोकसभा चुनाव लड़ा और कांग्रेस बुरी तरह पराजित हुई। तब बीजेपी अपनी सरकार केंद्र में बना सकी तथा मुरारजी देसाई प्रधानमंत्री और चैधरी चरण सिंह गृह मंत्री । जो बाद में प्रधानमंत्री भी बनें। उस दौरान जिस तरह से इंदिरा गांधी के पीछे सारे राजनीतिक दलों के नेता उनकी कमियां गिनाने और कांग्रेस के पाटभर््ी नेतृतव को कमजोर करने में लगे थे और उन्हे बिल्कुल ही जनाधार विहीन नेता के रूप में प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छेाड़ रहे थे। तब इंदिरा गांधी ने देश भर का दोैरा किया और सब यह देखकर ताज्जुब में रह गए कि जहां वो जाती थी हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उमड़ पड़ते थे। उसके बाद जो चुनाव हुए उसमे श्रीमति इंद्रा गांधी सरकार बनाने मे सफल रही।
कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि जितना सत्ताधारी दल जिस बड़े नेता को घेरता है वो उतना ही जनता के निकट पहुंच जाता हैं । इमरजैंसी के बाद जो इंदिरा गांधी के साथ हुआ वही वर्तमान में राहुल गांधी के साथ कम व ज्यादा हो रहा है। इसलिये कल जिसे पप्पू कहते थे आज अनेक विरोधी दल के नेता उनके राजनीतिक हमलों से बोखलाए से लगते हैं। इसलिये मुझे लगता है कि कांग्रेस जैसे हर गली मोहल्ले गांव देहात पूरब, पश्चिम उत्तर दक्षिण सभी में कार्यकर्ताओं और कांग्रेस विचार धारा के लोगों की जो उपस्थिति है वो राहुल गांधी के नेतृत्व में और सोनिया गांधी के मार्ग दर्शन में राहुल के झंडे के नीचे एकत्रित होने में देर नहीं लगाईगी। तथा मनमोहन सिंह जी मोती लाल वोहरा, गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, जैसे कददावर नेताओं के प्रयासों से सब एक हो सकते हैं। ऐसे में अगर राहुल गांधी और उनके सिपे सलाहकार कुछ चाटूकारों जो सभी जगह एकत्रित हो जाते हैं के चक्रव्यूह से उन्हे बाहर निकलकर गांव गली मोहल्ले में मौजूद अपने कार्यकर्ताओं और वहां के नेताओं का मनोबल बढ़ाने तथा स्वयंभू कांग्रेेसियों को मुख्य धारा से जोड़कर आम कार्यकर्ता के संपर्क में लाने में सफल हो गए तो यह कहने में कोई हर्ज महसूस नहीं करता हूं कि 2019 के चुनाव में सत्ता मिले ना मिले कांग्रेस एक बड़े मजबूत विपक्ष की भूमिका केंद्र सरकार में उभकर निभाने की स्थिति मे होगीं।

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– रवि कुमार विश्नोई
राष्ट्रीय अध्यक्ष – आॅल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन आईना
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
MD – www.tazzakhabar.com

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